जोरावर गढ़ और रंभाला का रहस्य
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
लेखक ---- शक्ति सिंह नेगी
जोरावर गढ़ व रंभाला का रहस्य
मैं एक लेखक हूं। मेरे लेख और कहानियां पत्र-पत्रिकाओं तथा सोशल मीडिया में प्रकाशित होते रहते हैं। अनेक पाठक- पाठिकाओं के पत्र इस संबंध में मुझे आते रहते हैं। अभी - अभी मैं सोकर उठा था। दैनिक नित्यकर्म से निवृत्त होकर मैं अपनी स्टडी - रूम में कुछ लिख रहा था कि अचानक किसी ने कॉल - बेल बजाई। मैंने उठकर दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे पर पोस्ट मैन खड़ा था।
उसने मुझे एक पत्र दिया। मैंने पत्र खोला तो पता चला कि यह राजस्थान की किसी पूर्व रियासत की राजकुमारी का पत्र था। पत्र का कागज बहुत महंगा व सुगंधित था। राजकुमारी जिसका नाम राजकुमारी प्रिया था, ने लिखा था कि
सेवा में,
श्रीमान प्रताप सिंह जी।
मैं आपकी रचनाओं की एक क्षुद्र पाठिका हूं। पहले भी मैं आप से पत्र - व्यवहार कर चुकी हूं। मैंने मेरी रियासत की प्राचीन लाइब्रेरी को देखने का आपसे अनुरोध किया था। आपने इस विषय में अपनी सहमति दी थी। क्या आप इसी हफ्ते हमारे गरीब खाने में पधार सकते हैं। आप मुझसे फोन पर भी बात कर सकते हैं। मेरा फोन नंबर -------- है।
-----जोरावरगढ़ की राजकुमारी
कुमारी प्रिया
मैंने दिए गए मोबाइल नंबर पर अपने मोबाइल से कॉल की। फोन प्रिया ने ही उठाया। मैंने प्रिया को बताया कि इस सोमवार तक में जोरावर गढ़ पहुंच जाऊंगा। सोमवार होने में अभी 5 दिन थे। मैं तैयारियों में जुट गया। दो-तीन जोड़ी अच्छे कपड़े, डायरी, पेन कुछ रूपये आदि मैंने एक छोटे बैग में डाले। और बस स्टैंड की तरफ चल पड़ा।
वहां से 5 घंटों के सफर में मैं ऋषिकेश पहुंच गया। ऋषिकेश से बस पकड़ कर में दिल्ली पहुंच गया। दिल्ली से बस पकड़कर मैं जयपुर पहुंच गया। जयपुर में मैं एक होटल में रुक गया। वहां नहा धोकर मैंने भोजन किया और शांति से सो गया। एक-दो दिन जयपुर में गुजारने के बाद मैंने प्रिया को फोन किया और उसे बताया कि अगले दिन मैं जोरावर गढ पहुंच जाऊंगा।
अगले दिन मैं एक छोटी गाड़ी बुक कर के जोरावर गढ़ पहुंच गया। जयपुर से जोरावर गढ़ 45 किलोमीटर दूर था। प्रिया ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। प्रिया एक तीस - पैतीस वर्ष की अत्यंत सुंदर युवती थी। राजसी रौब की झलक उसके सुंदर चेहरे पर थी। वह अत्यंत गौर वर्ण व साढे पांच फीट लंबे कद की थी। इस समय वह जींस व टॉप पहने हुई थी।
राजे - रजवाड़े आजादी के बाद खत्म कर दिए थे। परंतु कुछ भूतपूर्व राजा और राजकुमारी लोग आजादी के बाद नेता, उद्योगपति आदि बन गए थे। राजकुमारी प्रिया के पिताजी के पास अथाह धन व महल थे। चतुर प्रिया ने अपने 10 महलों में से 9 महलों को फाइव स्टार होटल्स में तब्दील कर दिया था और एक सबसे शानदार महल राज - पैलेस अपनी रिहाइश के लिए रख लिया।
मुझे राज पैलेस के मेहमान खाने में ठहराया गया। जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं मौजूद थी। मैं जाते ही सो गया। कुछ घंटों बाद मेरी नींद खुली। बाथरूम में जाकर मैंने स्नान आदि किया। फिर दूसरे कपड़े पहन कर सोफे पर बैठ गया। अब मैंने कमरे पर नजर दौड़ाई तो देखा कि कमरा बहुत साफ - सुथरा था। एक किनारे मेज पर कुछ दुर्लभ पुस्तकें व खाली नोटबुक रखी हुई थी। कुछ पेन भी वहां रखे हुए थे। मैं समझ गया कि यह इंतजाम मेरे लिए ही है।
मैं एक खाली नोटबुक लेकर उस पर लिखने लगा। पेन और नोटबुक का पेपर दोनों महंगे और सुगंधित थे। मैं दुर्लभ पुस्तकों का अध्ययन कर उनका सारांश नोटबुक में लिखने लगा। तभी कॉल बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि राजकुमारी प्रिया अपने हाथों में भोजन की थाली लेकर खड़ी थी। उसके साथ दो महिला अंगरक्षक खड़ी थीं। प्रिया थाली लेकर अंदर आई और उसने थाली सामने एक खाली मेज पर रख दी। दोनों अंगरक्षक बाहर ही खड़ी रही।
प्रिया - आप भोजन कर लीजिए।
मैं - ठीक है राजकुमारी जी।
प्रिया - मैं कुछ देर में आती हूं।
मैं - ठीक है जी।
मैंने भोजन कर लिया और हाथ - मुंह धो कर सो गया। सुबह 4:00 बजे मेरी नींद खुली नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यायाम, योगासन आदि करके मैंने स्नानादि किया और नोटबुक पर लिखने लगा। लगभग 8:00 बजे प्रिया कमरे में दाखिल हुई और बोली चलिए आपको अपनी लाइब्रेरी दिखा लाऊं। नाश्ता कर हम दोनों तैयार हो गए।
प्रिया के साथ मैं लाइब्रेरी में पहुंचा। लाइब्रेरी एक लंबे - चौड़े हॉल में थी। वहां सुंदर महंगी बड़ी-बड़ी अलमारियां लगी हुई थी। उनमें पुस्तके सलीके से रखी हुई थी। लाइब्रेरी के दरवाजे पर चार बड़ी - बड़ी मूछों वाले पहलवान किस्म के व्यक्ति बंदूक थामे खड़े थे।
हाल में सफेद वस्त्र पहनें तीन - चार व्यक्ति बैठे हुए थे। हमारे पहुंचते ही सब ने हम दोनों का अभिवादन किया। प्रिया बोली ये हैं हमारे देश के प्रख्यात रचनाकार प्रताप सिंह जी। इनकी ख्याति पूरे देश - विदेश तक फैली है। यह कई भाषाओं के जानकार हैं। इनकी लेखिनी कई विषयों पर चलती है।
मैंने पुस्तकों का अवलोकन किया तो पाया कि विश्व की सभी श्रेष्ठ पुस्तकें यहां मौजूद हैं। तथा विश्व की कई दुर्लभ पुस्तकें भी वहां पर हैं।
फिर प्रिया मुद्दे पर आते हुए बोली आप हमारे राज महल में रहें और मेरे और मेरे परिवार के बारे में एक पुस्तक लिखें।
मैं - क्यों?
प्रिया - मैं चाहती हूं कि आप हमारे बारे में ऐसा लिखें कि हमारे वंश की प्रतिष्ठा और बढे।
मैं - वह तो ठीक है कुमारी जी। परंतु मैं ऐसा करूंगा क्यों?
प्रिया - ताकि देश की जनता को देश के प्रति हमारे योगदान का पता लगे।
मैं - लेकिन मैं केवल सच्ची बातें ही लिखूंगा।
प्रिया - ठीक है। इसके लिए आप जो फीस चाहें वह मैं दूंगी।
मैं - ठीक है। मेरे भी बाल बच्चे हैं। लेकिन मैं नौकर बनकर काम नहीं करूंगा। आप कांट्रेक्ट बेस पर मुझे फीस दे सकती हैं।
प्रिया - (खुशी से उछल कर) - ठीक है। मैं आपको इस कार्य के लिए ₹40 करोड दूंगी।
मैं - यह तो बहुत कम है। मैं 110 करोड़ लूंगा।
प्रिया - ठीक है। 101 करोड़ पर बात पक्की।
मैं - ठीक है जी। आप इस खाते में यह रकम डाल दीजिए। (मैंने प्रिया को अपना अकाउंट नंबर दे दिया।)
प्रिया - अभी 2 मिनट में मैं यह रकम आपके खाते में डाल देती हूं। (प्रिया अपने मैनेजर को फोन करती है और उससे कुछ आदेशात्मक लहजे में कहती है।)
कुछ देर में मेरे मोबाइल पर एक सौ एक करोड़ रू. मेरे खाते में आने का मैसेज आता है।
प्रिया - यहां आप राजमहल में ठहर कर मेरा मान बढ़ाएं। आपका रहना - खाना, घूमना सब मेरी तरफ से होगा। साथ ही मैं आपको अपना एक फाइव स्टार होटल व एक कार गिफ्ट करती हूं।
मैं - जी धन्यवाद। अब आप बताइए कहां से शुरू करें।
प्रिया - जी आपकी मर्जी है। मेरे सभी संसाधन आपकी सेवा में हैं।
मैं - जी मैं पूरे इलाके में घूमूंगा - फिरूंगा लाइब्रेरी में अध्ययन करूंगा। लिखूंगा।
प्रिया - जी धन्यवाद।
मैं अब प्रिया द्वारा दी गई कार में बैठकर अकेला ही पूरे जोरावर गढ़ के भ्रमण पर निकल गया। प्रिया के सभी होटलों का निरीक्षण किया। गिफ्ट में मिले होटल में कुछ देर वहां के स्टाफ के साथ रहा। कुछ नोट्स लिए और अपने कमरे में आ गया।
कमरे में आकर मैंने थोड़ा आराम किया और नहा - धोकर बालकनी में खड़ा हो गया। कमरे में प्रिया ने नए कपड़े व विभिन्न किस्म के सेंट रखवा दिए थे। मैंने उनका भरपूर उपयोग किया।
अक्सर मैं प्रिया के साथ जोरावर गढ के नगर व जंगलों में भ्रमण करने चला जाता था। अब तक मुझे जोरावर गढ में 2 माह हो चुके थे। अतः यहां के चप्पे - चप्पे से परिचित हो चुका था। प्रिया मुझसे वरिष्ठ मित्र सा व्यवहार करती थी।
जोरावर गढ की आबादी लगभग 20 लाख थी। यह आबादी किले में व किले के बाहर बसी हुई थी। यहां सभी लोग बहुत संपन्न थे। परंतु 40% लोग बहुत गरीब थे। अर्थात् 8 लाख लोग बहुत गरीब थे।
हालांकि अब यह भारत की प्रजा थे। परंतु यह लोग अभी भी प्रिया को अपनी महारानी मानते थे। मुझे अपने होटल से लगभग एक करोड रुपए प्रतिमाह आमदनी होने लगी थी। मैंने इस आमदनी का आधा भाग अर्थात 50 लाख रुपए प्रतिमाह गरीबों के उत्थान, पढ़ाई, भोजन, मकान, दवाई आदि पर लगाना शुरू किया।
प्रिया मेरे कार्य से बहुत प्रसन्न हुई। उसने भी अपनी आधी कमाई अर्थात चार करोड़ रू. प्रतिमाह गरीबों के उत्थान पर लगाना शुरू कर दिया।
मैंने अपने होटल में कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई। काम के घंटे कम कर 8 घंटे किये। नए अच्छे कर्मचारियों की भर्ती की। तथा कुछ पुराने काम - चोर बदमाश कर्मचारियों को निकाल बाहर किया। अब होटल और भी अच्छा चलने लगा। यह देख प्रिया ने अपनी होटलों में भी यही करने की सोची। मैंने इस कार्य में उसका पूरा साथ दिया।
मेरी सलाह पर प्रिया ने अपने महल के कर्मचारियों की भी सैलरी व सुविधाएं बढ़ाई व उनके काम के घंटे भी कम करके 8 घंटे कर दिए। अब कर्मचारी - गण व पब्लिक हमसे बहुत प्रसन्न और खुश हो गई। मैंने प्रिया को राजनीति में उतरने की सलाह दी। प्रिया ने एक प्रतिष्ठित पार्टी से टिकट लेकर एम.पी. का चुनाव जीत लिया। प्रिया के अनुरोध पर मैं भी राजनीति में आ गया और मैं भी एम.पी. बन गया।
अब सरकारी प्रयास व हमारे व्यक्तिगत प्रयासों से यहां की प्रजा खुशहाल और समृद्ध हो गई। सभी गरीब अमीर बन चुके थे। अब तक मैं जोरावर गढ़ का इतिहास नाम से आधी पुस्तक लिख चुका था। 2 साल बीत चुके थे। इस बीच मैं प्रिया से अनुमति लेकर अपने घर आता-जाता रहता था। जोरावर गढ में परिवार नियोजन पूर्ण रुप से लागू कर जनसंख्या स्थिर कर दी गई।
मैंने हजारों पुस्तकों, म्यूजियम पुरानी सभ्यताओं आदि के अध्ययन से काफी महत्वपूर्ण जानकारियां अर्जित कर पुस्तक में लिखी। जोरावर गढ़ के आसपास के स्थलों और पुरातात्विक स्थलों की भी जानकारियां मैंने पुस्तक में लिखी। अब ये जानकारियां मिलकर यह कहानी सामने आई।
आज से 9000 साल पहले यहां पूर्व - द्वारिका कालीन सभ्यता थी। 5000 वर्ष पहले यहां महाभारत कालीन सभ्यता थी। इस महा - गढ ने अनेकों आक्रमण झेले। खुदाई में मिले नर कंकालों से पता चला कि अनेक जातियों व सभ्यताओं के लोगों के यहां से व्यापारिक संबंध थे। अनेक आक्रमणकारियों ने यहां आक्रमण किया। 9000 वर्ष पुराने एक नर कंकाल का डी.एन.ए. स्वयं राजकुमारी प्रिया के डी.एन.ए. से मिला।
यह 9000 वर्ष पुराना नर कंकाल महाराज विश्वजीत का था। यह बहुत पराक्रमी राजा थे। यह भूकंप में तबाह नगर के मलबे में अपने कुछ प्रजाजनों के साथ दब गये थे। 5000 वर्ष पूर्व यहां के राजा महाभारत युद्ध में पांडवों के पक्ष में थे। शक, सीथियनों, हूणों, मुगलों व अंग्रेजों से यहां के राजाओं ने युद्ध किया था। राज कुमारी प्रिया भगवान राम की 286 वीं वंशज थी।
इस 286 वीं वंशज ने अपने मित्र प्रताप के निर्देशन में प्रजा का उत्थान व विकास किया। अब पुस्तक पूर्ण हो चुकी थी। प्रिया ने इस पुस्तक को एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित करवाया। सारी रायल्टी प्रताप के नाम कर दी गई।
प्रताप ने अब प्रिया से विदा मांगी। प्रिया ने अश्रुपूरित नेत्रों से प्रताप को विदा दी। परंतु यदा-कदा मिलते रहने का वचन ले ही लिया।
रंभाला का रहस्य
प्रताप अपनी स्टडी में बैठकर एक दुर्लभ पुस्तक का अध्ययन कर रहे थे। उनकी पत्नी उनके द्वारा कही गई बातों को कंप्यूटर पर माइक्रोसॉफ्ट वर्ड पर टाइप कर रही थी। अचानक उनके मोबाइल की घंटी बजने लगी। प्रताप ने फोन उठाया तो प्रिया की आवाज आई - प्रिय मित्र प्रताप को नमस्कार।
प्रताप - नमस्कार। कहिये प्रिया जी। क्या हाल-चाल हैं?
प्रिया - हाल-चाल तो ठीक हैं जी। आप अपनी सुनाइए।
प्रताप - यहां भी सब ठीक - ठाक हाल हैं जी। मेरी इकलौती पुत्री रिषिका ने देश भर में NEET की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया है और अब वह एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला ले चुकी है।
प्रिया - तब तो घर में आप मिंया - बीबी अकेले होंगे? आपका टाइम कटता कैसे होगा?
प्रताप - बीवी को मैंने अपने लेखन व्यवसाय से जोड लिया है। मैं बोलता रहता हूं और वह टाइप करती रहती है।
प्रिया - और खाना कौन बनाता है? हा हा हा।
प्रताप - खाना भी हम मिल - जुलकर बना लेते हैं। हा हा हा। बताइए कैसे याद किया?
प्रिया - आपके लिए काम है अफ़्रीका में। वहां के एक वर्तमान राजा अपने वंश का इतिहास लिखाना चाहते हैं आपसे।
प्रताप - ठीक है उनका कांटेक्ट नंबर दीजिए।
प्रिया प्रताप को राजा का कांटेक्ट नंबर देती है। प्रताप राजा से बात करता है। राजा अंग्रेजी में बात करता है। राजा 2 करोड रुपए टिकट आदि के लिए प्रताप के खाते में ट्रांसफर कर देता है। 2 दिन बाद प्रताप अपने कुछ कपड़े और लेखन सामग्री अपने छोटे से बैग में डालता है और अपनी पत्नी से विदा लेकर एयरपोर्ट की तरफ चल पड़ता है। वहां से फ्लाइट द्वारा वह अफ्रीका के पुलुपुलू शहर जा पहुंचता है।
पुलुपुलु में राजा द्वारा भेजी कार द्वारा वह राजा के महल पहुंच जाता है। अपने महल में राजा प्रताप का भव्य स्वागत करते हैं। राजा काले रंग के, सात फीट लंबे, बलिष्छ व यूरोपियन वेशभूषा में थे। राजा का नाम किंगालू था।
किंगालू (अंग्रेजी में) - आपका स्वागत है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद किंगालू जी।
किंगालू - आपको अफ्रिका आने में कोई कष्ट तो नहीं हुआ श्रीमान।
प्रताप - जी नहीं श्रीमान।
किंगालू - हमने आपको अपने पूर्वजों व अफ्रीका महाद्वीप का इतिहास लिखने के लिए बुलाया है श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद महाराज।
किंगालू - हम आपको इसका मनचाहा पारिश्रमिक देंगे श्रीमान।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
किंगालू - हम आपको दो अरब भारतीय रुपए देंगे। साथ में अफ्रीकन नस्ल का कुत्ता, एक महल, एक फाइव स्टार होटल, महंगी कार और 20 दास - दासिंयां आपके हुये।
प्रताप - धन्यवाद। आप यह रकम मेरे खाते में डाल दीजिए और अन्य वस्तुएं भी मेरे को सुपुर्द कर दें। यह रहा मेरा खाता नंबर।
किंगालू तुरंत प्रताप के खाते में रकम ट्रांसफर कर देता है और प्रताप के साथ एक महल में जाता है।
किंगालू - यह महल, कुत्ता, कार, दास -दासियां आपके हुए। सामने खड़ा फाइव स्टार होटल भी आपका हुआ। ये रहे इनके कागजात।
प्रताप - धन्यवाद श्रीमान।
कुछ दिन तक प्रताप किंगालू के साथ उसके देश और पूरे अफ्रीका महाद्वीप की सैर करता है। और अपनी डायरी में महत्वपूर्ण बातें नोट करता रहता है।
अब तक प्रताप को अफ्रीका में 6 माह हो गया है। इतने समय में वह अफ्रीका की महत्वपूर्ण जगहों व इतिहास के बारे मैं काफी कुछ जान चुका है। उसका वफादार कुत्ता रैम्बो व अंगरक्षक जाबुआ भी उसी के साथ साये की तरह रहते हैं।
प्रताप को अपनी होटल से प्रतिमाह दो करोड़ भारतीय रुपयों के बराबर इनकम हो रही है। प्रताप अपने होटल के कर्मचारियों की सैलरी व सुविधाएं बढ़ा देता है। कुछ अच्छे नए कर्मचारी रख लेता है तथा कुछ पुराने कामचोर व झगड़ालू कर्मचारियों को हटा देता है। वह काम के घंटे घटाकर 8 घंटे कर देता है। इस सब से उसके होटल की इनकम और बढ़ जाती है। कर्मचारी खुशहाल और समृद्ध हो जाते हैं।
प्रताप हर माह अपने होटल की आधी इनकम ₹1 करोड वहां के गरीबों के विकास के लिए लगा देता है। महाराज किं- गालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश होते हैं। किंगालू के राज्य में 80% लोग गरीब थे। किंगालू के पास अथाह धन था। वह इसका कुछ हिस्सा गरीबों की मदद में लगा देता है। कुछ ही समय में देश में गरीबों को रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार आदि सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
प्रताप के कहने पर किंगालू एक पाठ्यक्रम, एक ध्वज, एक भाषा, एक समान कानून, एक संविधान, अपने देश में लागू कर देता है। किंगालू परिवार नियोजन द्वारा अपने देश की जनसंख्या स्थिर कर देता है। चकबंदी, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि कार्य भी वह करता है। अब किंगालू का देश सुखी व समृद्ध हो जाता है।
अब तक प्रताप को वहां 1 वर्ष हो चुका था। बीच-बीच में वह अपने घर भारत व अन्य जगह किंगालू से अनुमति लेकर जाता रहता था। अब तक वह अफ्रीका का इतिहास नामक पुस्तक लगभग आधी लिख चुका था।
किंगालू ने प्रताप को बताया कि एक आदमखोर शेर लोगों को खा रहा है। चलो शेर का शिकार करें। किंगालू और प्रताप कुछ सिपाहिंयों के साथ शेर के शिकार के लिए जंगल में चले। अचानक आदमखोर शेर ने किंगालू पर आक्रमण कर दिया। किंगालू ने कई गोलियां चलाई। परंतु कोई भी गोली प्रताप को नहीं लगी। अचानक प्रताप निहत्था ही शेर से भिड गया। प्रताप ने हाथ - पैरों से ही शेर को मार - मार कर भर्ता बना दिया। शेर ने दम तोड़ दिया।
किंगालू बहुत खुश हुआ। उसने अपने प्राण रक्षक प्रताप को बहुत -2 धन्यवाद दिया। किंगालू ने प्रताप को समुद्र में बने एक बहुत बड़े द्वीप को गिफ्ट में दिया। तथा साथ ही साथ बहुत से रुपये, सोना, चांदी, जवाहरात माणिक आदि भी दिये। किंगालू ने प्रताप को उस द्वीप का राजा बना दिया। साथ ही 5000 लोगों की एक सैन्य टुकड़ी दी।
प्रताप ने उस द्वीप का राजा बनते ही स्वयं को स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया। उस द्वीप पर दो लाख लोग फटेहाल हालत में रहते थे। प्रताप ने सर्वप्रथम जनसंख्या नियंत्रण कर चयनित जनन करवाया। अब दीप की आबादी 2लाख पर ही स्थिर हो गई। प्रताप ने सारे द्वीप को आधुनिक मशीनों से समतल करवाया और वहां खेत - बगीचे, एक आधुनिक स्मार्ट शहर बसाया। प्रताप ने द्वीप के 200000 आदिवासियों को नवनिर्मित शहर में बसाया। उन्हें रोजगार रोटी, कपड़ा, मकान,शिक्षा, दवाई व अन्य सुविधाएं प्रदान की।
प्रताप ने अपनी नई प्रजा के सभी वयस्क लोगों को आधुनिक सैन्य प्रशिक्षण भी दिया। वहां 50000 बच्चे व बूढ़े थे। डेढ़ लाख लोग वयस्क थे। अब प्रताप के पास डेढ़ लाख से भी ज्यादा की विशाल फौज हो गई। इसमें स्त्री-पुरुष दोनों थे। प्रताप ने अपनी प्रजा को विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध करवाई। आर्मी, नौसेना, नभ सेना, पुलिस, सीमा सुरक्षा दल आदि की स्थापना की। व्यापार को बढ़ावा दिया।
द्वीप में सोने - चांदी की खानों से प्रताप ने बहुत धन कमाया। आधा धन द्वीप के विकास में तथा आधा तहखाने में सुरक्षित रखा गया। समुद्र से मोती निकाले गये। कुछ ही समय में यह देश आर्थिक और सामरिक दृष्टि से एक महाशक्ति बन गया। प्रताप ने यहां की एक सुंदर लड़की से शादी कर द्वीप वासियों से अपना रक्त संबंध जोड़ दिया। प्रताप ने इस देश का नाम प्रतापलैंड रख लिया।
इस देश को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई। प्रताप ने एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति, एक देश, एक कानून, एक संविधान, एक झंडा, एक पाठ्यक्रम, एक मुद्रा अनिवार्य कर दिया। सभी को यूरोपियन ढंग से रहने व यूरोपीय पोशाक धारण करना अनिवार्य कर दिया। बाहर के वैज्ञानिकों को भी इस द्वीप में बसाया। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी इस देश ने बहुत उन्नति की।
किंगालू प्रताप के कार्यों से बहुत खुश हुआ। उसने भी अपने देश में प्रताप का अनुकरण किया। किंगालू ने अपनी पुत्री का विवाह भी प्रताप से कर दिया। प्रताप बीच-बीच में अपने घर भारत आता - जाता रहता था। इसी बीच किंगालू के प्रयासों से ही प्रताप को अफ्रीकन देशों के संघ का अध्यक्ष बना दिया गया। इस बीच प्रताप अपनी पुस्तक लगभग पूर्ण कर चुका था। अब पुस्तक में एक चैप्टर जोड़ना ही बाकी था।
पुलुपुलु में एक रहस्यमई किला था रंभाला। रात्रि में एक चारभुजा वाला व्यक्ति उस किले में घूमता रहता था। वह वहां से गुजरने वाले मनुष्य और जानवरों को वह मारकर खा जाता था।
प्रताप व किंगालू अपने साथ 10 सैनिकों को लेकर किले की तरफ चले। सैनिक तीर - धनुष, भाले, तलवार, बंदूक से सुसज्जित थे। वे किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे। अचानक एक चमगादड़ों का झुंड आया और उसके सैनिकों पर आक्रमण कर दिया। सैनिकों ने जवाब में तीर, भाले, गोलियां चलाई। कुछ चमगादड़ मारे गये। बाकी भाग गये। किंगालू के 2 सैनिक भी चमगादडों के हमले में मारे गए। पूरा किला जंगली झाड़ियों व पेड़ों से घिरा हुआ था। बाकी लोग आगे बढ़े। दूसरे दरवाजे पर अचानक बहुत से सांपों ने हमला बोल दिया। सैनिक तीर व गोलियां चलाते हुये आगे बढ़ने लगे। 2 सैनिक यहां भी सांपों के काटने से मारे गए।
अब कुल 6 सैनिक किंगालू व प्रताप बचे थे। तीसरे दरवाजे पर पहुंचते ही एक 10 फुट के काले रंग के व्यक्ति ने हमला बोल दिया। इस व्यक्ति के चार हाथ थे। शरीर सिर से नीचे उसका मनुष्य जैसा ही था। सिर की जगह उसका शेर का सिर था। सभी व्यक्ति उस दानव को घेरकर प्रहार करने लगे। दानव एक - एक कर सैनिकों को मारने लगा। अचानक किंगालू ने एक भाला दानव के दिल में घोंप दिया।
बचे सैनिक दानव पर गोलियों व तीरों की बारिश कर रहे थे। परंतु उस पर कोई खास असर नहीं हो रहा था। अचानक प्रताप ने तलवार का प्रहार उछलकर दानव की गर्दन पर किया। दानव की गर्दन कट कर दूर जा गिरी। दानव गिरकर मर गया। अब केवल 2 सैनिक, किंगालू व प्रताप ही जीवित बचे थे। चारों ने मिलकर सूखी घास, लकड़ी आदि जमा की और दानव के शरीर को आग लगाकर भष्म कर दिया।
अब चारों बाहर आए। अब किंगालू ने अपने अन्य सैनिकों को इस पुराने किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने फावडे, सब्बल आदि लेकर किले को कुछ ही घंटों में ध्वस्त कर दिया। चार भुजाओं वाला सिंह मुखी दानव वास्तव में एक विलुप्त प्रायः आदिमानव की जाति से था। इस दानव के अंत के साथ पूरे देश मैं खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने रंभाला का रहस्य भी अपनी पुस्तक में जोड़ा और पुस्तक पूर्ण कर ली।
यह पुस्तक भी एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से प्रकाशित हुई और प्रताप को बहुत सा धन रॉयल्टी के रूप में मिला। किंगालू पुस्तक के पूर्ण होने पर बहुत प्रसन्न था। इस खुशी में उसने बहुत बड़े जश्न का आयोजन किया।
प्रताप मंगल ग्रह पर
प्रताप का अंतरिक्ष मिशन जोरों पर चल रहा था। नासा और इसरो के साथ मिलकर प्रताप ने मंगल पर बस्तियां बसाने का काम शुरू किया। प्रताप ने अपने देश के 5000 मानवों को मंगल ग्रह पर बसाया। हजार - हजार के ग्रुप में 5 जगहों पर मंगल ग्रह पर इनकी बस्तियां बसाई गई।
अचानक हरे रंग के बौने मंगल मानवों ने प्रताप के लोगों पर हमला करना शुरू कर दिया। प्रताप ने उन्हें हराकर एक तरफ खदेड़ दिया। एक बस्ती इन के लिए बनाकर प्रताप ने सभी हरे रंग के बौने मंगल मानवों को एक निश्चित क्षेत्र में बसा दिया। प्रताप ने इनकी जनसंख्या नियंत्रण कर के स्थिर कर दी। अब इन लोगों ने प्रताप से मित्रता कर ली। इनकी संख्या चार हजार के करीब थी। प्रताप ने इन की रानी कुटिपिया से विवाह कर लिया।
मंगल पर भी प्रताप ने एक सेना का निर्माण किया। इसमें 500 हरे मंगल मानव व 2000 उसके अपने सैनिक थे। अब मंगल का सम्राट प्रताप व कुटिपिया साम्राज्ञी थी। इन से एक पुत्र बेब्रुवेन उत्पन्न हुआ। प्रताप ने इसे मंगल का युवराज बना दिया।
मंगल पर कृत्रिम वायु मंडल बनवाया गया। खेत, नहरें, उपवन आदि भी बनाए गए।
इसके बाद प्रताप ने चंद्रमा पर भी 5000 मानवों की बस्तियां बसाई। इसी तरह प्रताप ने सौर मंडल के सभी ग्रहों पर बस्तियां बसाई। केवल शुक्र ग्रह छूट गया था। शुक्र ग्रह पर शुक्राचार्य के निर्देशन में 20 अरब भयंकर विशाल दानव रहते थे। प्रताप ने केवल अत्याधुनिक एक हजार सैनिकों के साथ शुक्र ग्रह पर आक्रमण कर दिया। दानवों की विशाल सेना मैदान में आ डटी। परंतु प्रताप के रण कौशल व युद्ध टेक्नोलॉजी के सामने दानव टिक नहीं पाए। कुछ ही घंटों में अधिकांश दानव सैनिक मारे गए। दानवों ने हार मान ली। प्रताप ने शुक्र ग्रह पर कब्जा कर लिया और कुछ दानवों को छोड़कर बाकी सब की नसबंदी कर दी गई। दानवों को ग्रह के एक कोने की तरफ धकेल दिया गया। दानव उसी कोने में बस गये। प्रताप ने दानवों की राजकुमारी से विवाह कर लिया। इस से उसे एक खटोत्कुच नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रताप शुक्र ग्रह का भी सम्राट बन गया। इस पुत्र को प्रताप ने शुक्र ग्रह का युवराज बनाया।
इसी बीच प्रताप की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर पृथ्वी के सभी देशों ने मिलकर प्रताप को अपना सम्राट स्वीकार कर लिया। अब प्रताप सौर मंडल के सभी ग्रहों का सम्राट बन चुका था। अचानक इसी समय कुछ विचित्र मानव प्रताप की सेना पर आक्रमण करने लगे। यह मानव अग्नि द्वारा निर्मित थे। कुछ अग्नि मानव पकड़े गए। इन पर प्रताप के वैज्ञानिकों ने रिसर्च की। प्रताप के गुप्तचर विभाग ने अग्नि मानवों से पूछताछ की तो पता चला कि यह लोग सूर्य पर गुप्त रूप से रहते हैं। प्रताप के वैज्ञानिकों ने सूर्य पर जाने के लिए स्पेशल यान व कपड़े बनाए।
अब प्रताप ने सूर्यलोक पर आक्रमण कर दिया। सूर्य लोक पर अग्नि मानव रहते थे। परंतु वे प्रताप की सेना से हार गये। प्रताप ने कुछ हजार अग्नि मानवों को छोड़कर सब की नसबंदी करवा दी। वे अब वहां पर एक कौने में रहने लगे। वहां की राजकुमारी से प्रताप को सुधर्मा नामक पुत्र प्राप्त हो गया। प्रताप ने इसे सूर्यलोक का युवराज घोषित किया।
अब प्रताप पूरे सौरमंडल का सम्राट बन चुका था। अतः प्रताप ने सर्व सम्राट की उपाधि धारण की। और अपनी इकलौती पुत्री रिषिका को सर्व युवराज बना दिया। सुधर्मा को प्रताप ने सूर्य व अन्य ग्रहों पर ढाई - ढाई हजार सैनिकों की अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी रखी। और 5000 - 5000 अन्य मानवों की बस्तिसां बसाई।
उसने सभी ग्रहों व सूर्य पर उन्नत गाय - भैंस भेजे। वहां उन्नत खेती करवाई। हर ग्रह व सूर्य का चुस्त प्रशासन रखा। पूरे सौरमंडल में आनंद व समृद्धि की लहर दौड़ गई। अब प्रताप का लक्ष्य सौरमंडल व आकाशगंगा ही थी। उसके वैग्यानिक वहां जाने की संभावना पर रिसर्च करने लगे।
ब्रह्मांड पर विजय
प्रताप ने एक 5000 सैनिकों की टुकड़ी बनाई। यह टुकड़ी अत्याधुनिक सैनिक टुकड़ी थी। इसके यान प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से चलते थे। प्रताप ने खटोत्कुच के पुत्र बर्बर को इसका सेनापति बनाया। बर्बर के नेतृत्व में यह सेना ब्रह्मांड विजय पर निकल पड़ी। अनेक सौरमंडलों और आकाशगंगाओं पर इस सेना ने कब्जा कर लिया। रास्ते में देवलोक पडा। बर्बर ने उन से मित्रता पूर्वक संधि कर ली। फिर रास्ते में काल लोक पडा। बर्बर ने काल को शीश झुकाया। अंत में ईश्वर धाम पड़ा। बर्बर ने ईश्वर के प्रेम पूर्वक चरण स्पर्श किसे। ईश्वर ने बर्बर को अपना आशीर्वाद दिया।
बर्बर संपूर्ण ब्रह्मांड विजय कर वापस लौटा। प्रताप ने अपने पोते बर्बर को गले से लगाया। अब प्रताप के संपूर्ण ब्रह्मांड राज्य में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। प्रताप ने ब्रह्मांड सम्राट की उपाधि धारण की। प्रताप प्रताप देव कहलाने लगे। देवराज ने अद्भुत अमृत का पान भी महाराज प्रताप देव को करवाया। देवराज ने अनेक स्वर्गिक भेंटें भी अपने परम मित्र प्रताप देव को प्रदान की। इनमें कामधेनु की प्रतिमूर्ति सामधेनु, कल्प वृक्ष की प्रतिमूर्ति झल्पवृक्ष, आदि थी। इस प्रकार प्रताप देव सारे ब्रह्मांड के देव, दनुज, मनुज व अन्य प्राणियों के ब्रह्मांड सम्राट बने। प्रताप देव ने परमेश्वर को प्रणाम कर अपने पद को सबका महा सेवक पद मानकर परमेश्वर का धन्यवाद किया।
प्रताप ने पृथ्वी लोक पर भी जनसंख्या नियंत्रण कर यहां की आबादी भी सीमित कर दी। इन कार्यों से परमेश्वर की शक्ति 'प्रकृति देवी' प्रताप व उसकी प्रजा पर बहुत प्रसन्न हुई।
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